Friday, December 19, 2014

घर वापसी !!!

वो दोनों कुछ ही दिन पहले नये घर वापस आये थे. नये घर आकर वहां के पुराने घर वालो से उन्होंने पूछा कि अब हम नये घर आ तो गये हैं अब आगे क्या? जबाब मिला कि अभी तुम नये-नये हो और तुम्हारी नई-नई शुद्धि हुई है, इसलिए तुम्हे अकाल मृत्यू से रक्षा की जरुरत है.
अकाल मृत्यू का नाम सुनकर दोनों डर गये ! उन्हें डरा हुआ देख कर घर के पुराने लोगों ने कहा अरे डरो मत! तुम्हारे नये घर में सब चीज़ का जुगाड़ है ! बस तुम्हे महाकाल की शरण में जाना पड़ेगा. ये सुनकर वो दोनों थोड़े बे-फ़िक्र हुए. और घर के पुराने लोगो के बताये रास्ते पर महाकाल की नगरी पहुच गये.
उनकी गाड़ी दोपहर में पहुची. घर के पुराने लोगो ने कहा कि कल सुबह ४ बजे नहा धोकर आना.
दोनों तडके 4 बजे नहा धोकर पहुच गये.
देखा तो हजारो लोग अकाल म्रत्यु से बचने कि जुगाड़ में लाइन में लगे हुए है.
अलग अलग 4-5 तरह कि लाइने थीं.
दोनों ने सोचा कम लम्बी लाइन में लग जाते हैं जल्दी निपट जाएँगे.
जेसे ही कम लम्बी लाइन में घुसे .. बाहर खड़ा हुआ दरबान बोला :
"ऐ! रसीद बताओ!"
"कैसी रसीद?"
"लाइन में लगने की. ये 5000 वाली लाइन है."
"लेकिन भैया हम तो नये हैं !"
"नये हो या पुराने जल्दी निपटना है तो 5000 तो लगेंगे ही."
"इतने तो है नही."
"तो अपनी औकात वाली लाइन में जाओ."
हर लाइन से धक्के खाते हुए अंत में दोनों फ़ोकट वाली लाइन में पहुचे. कुछ २-३ किमी लम्बी लाइन में सबसे पीछे खड़े होकर डर डर के अपने आगे खड़े पुराने आदमी से पूछा:
"भैया कितना टाइम लग जाएगा पूरा सब होने में?"
आदमी बोला : "पहली बार आये हो क्या?"
" हाँ भैया! हम नये हैं."
" अच्छा! अन्दर तो एक सेकंड का काम है बस अन्दर पहुचने में २-३ दिन लग जाएँगे."
"अरे? जल्दी नही हो सकता क्या?"
"जल्दी करना है तो पैसा फेंको और नहीं तो चुपचाप यहीं खड़े रहो ."
जैसे तैसे दोनों अपनी अकाल मृत्यू टलवा के वापस घर आये. फिर कुछ पुराने लोगों ने पूछा:
"क्यूँ भैया? हो गया सब काम अच्छे से ?"
"हाँ भैया ! हो गया ! अब आगे क्या ?"
"आगे कुछ नही भैया! नये नये हो , तुम पर साड़े-साती कि दशा न आ जाए , इसलिए उपाय करवा लेना !!!"
!!! हरिओम !!!

Tuesday, January 21, 2014

जिम्मेदारी तय कर लो


आंधी सी दिखाई देती है तूफांन-ए-बबंडर उठता सा है 
तुम साथ चलो या चुप बेठो, मौजो का समंदर बढ़ता सा है  

इस ज़ार निरंकुश तानाशाही की बुनियादें हिलती दिखती हैं 
इक चिड़िया की परवाजों* से बाजों का मुकद्दर डुलता सा है 

सर्द  अँधेरी रातो में हमने  बिन कम्बल खर्राटे मारे हैं
जो जाग गया न सो पाएगा, पल में सूरज चढ़ता सा है

वक़्त का चरखा घूम गया कल नीचे था, अब ऊपर है 
जिम्मेदारी तय कर लो इतिहास बदलता दिखता सा है 

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* परवाज - उडान 

Sunday, December 22, 2013

नजरों मे इक हया का सुरूर भी तो रखिए।
जिंदगी में थोड़ा बहुत गुरूर भी तो रखिए।।

माना कि पाबंदियों मे कुछ भी नही आसां।
खुद के उसूलों को मशहूर भी तो रखिए।।

मन भागता है पीछे तकलीफ जहां कम हो।
अपने को इस व्यसन से कुछ दूर भी तो रखिए 

भेदेगा बुलंदियों को यकीनन तीर-ए-निशाना।
खुद को कभी मेहनत से चूर भी तो रखिए।।

Wednesday, November 20, 2013

सपने और यथार्थ !!!


“बेटा! क्या बनोगे बड़े होकर ?”
“इंजिनियर !”
“किस चीज़ का इंजिनियर ?”
“रेल गाड़ी का !”


ये सवाल और जबाब तब के हैं जब में हाफ पेंट पहन कर स्कूल जाता था । भोले मन ने इंजिनियर बनने का सपना तभी देख लिया था जब पहली बार किसी ने  बताया था की बड़े होकर कुछ बनना होता है ।  रेलगाड़ी का इंजिनियर इसलिए क्यूंकि घर रेलवे स्टेशन के पास था। रोज रोज इतने भारी  अजूबे को लोहे की पांतों पर सरपट दौड़ते देखकर भोला मन यही सोचता था की ये चमत्कार करने वाले अलौकिक शक्तिओ के स्वामी होंगे  रेलगाड़ी और इंजिनियर- इन दो शब्दों ने अन्तरंग में जगह बना ली थी और दोनों शब्द एक दुसरे के पर्यायवाची बन चुके थे जब कोई रेलगाड़ी दिख जाती तो इस चमत्कार के पीछे इश्वर रूपी अवतरण नजर आता जिसे चमत्कारों का वरदान प्राप्त हो, और जब कोई इंजिनियर की बात छेड़ता तो सरपट दौड़ती रेलगाड़ी की पौं पौं मन मस्तिस्क में छा जाती

खैर ये तो बालक मन था बालक मन की कल्पना की उड़ान भी अजीब ही होती है जैसे बहते पानी की धार को जहाँ जगह मिली वहीँ बह गया वैसे ही बालक मन को जहा खुली जगह मिली वही उड़ लिया


समय आगे बढ़ने लगा; उम्र बढ़ने लगी; समझ बढ़ने लगी  कल्पनाओ के प्रतिबिम्बों को यथार्थता के वास्तविक चित्र विस्थापित करने लगे
। गोयाकि
कच्ची उमर में मन में बुवे हुए बीजो की जड़े आजीवन रहती है
रेलगाड़ी तो धुंधली हो चुकी थी लेकिन इंजीनियरिंग का भूत चढ़ गया था
कोई महापुरुष कह गया था कि "सावधान ! सपने सोच समझ कर देखो , वो सच भी हो सकते हैं " माहोल कुछ ऐसा बना की पढने लिखने वाले सहपाठी मिल गये
मित्रो की मित्रता की धक्कम पेल में एंट्रेंस निकल गया और इंजीनियरिंग में दाखिला मिल गया
(आजकल तो पेसो में मिल जाता है, पढने की जरुरत नही है, ये वाकया तब का है जब गली गली में कॉलेज न थे ) 

मन प्रसन्न था; नया जोश था; खून में उबाल भी था कुछ भी काम असंभव न लग रहा था अच्छे कॉलेज में एडमिशन जो मिल गया था 

मस्तिष्क का मनोविज्ञान भी अजब है एक सफलता से ऐसा प्रतीत होता है मानो दुंनिया में कुछ भी असंभव नही, वही दूसरी तरफ एक असफलता यह महसूस करवा देती है कि पूरा जीवन ही निरर्थक है, अब कुछ नही हो सकता लेकिन ये तो समय का चक्र है, कभी ऊपर- कभी नीचे सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें! आगे क्या होता है 

जब उबले हुए रक्त की तपिश कम हुई, अतीत की सफलताओं की रंग रेलियों की स्मृतियाँ धुंधली पड़ने लगी, जब सामने जिम्मेदारिओं के पहाड़ो की ऊँची चोटिया चुनौती देने लगी तब एक दिन अचानक तन्द्रा भंग हुई और इस "रेलगाड़ी का इंजिनियर" बनने वाले मन ने खुद को कंप्यूटर की दुनिया में गोते लगाते पाया सब कुछ नया नया लगने लगा सपने अनजाने से लगने लगे पहले तो मन ने मानने से इंकार किया, लेकिन कल्पना वास्तविकता पर जायदा देर हावी नही रह सकती कोई और उपाय न था नये सपनो से दोस्ती ही आसान रास्ता था जब मन कभी उदास होता तो यह सोचकर सांत्वना मिल जाती कि रेलगाड़ी का न सही कंप्यूटर का सही, इंजिनियर तो है.  

अब सामने एक नया सपना था नई राह थी समय का पहिया और मनुष्य की अनुकूलन क्षमता दोनों का तालमेल सारे पुराने घाव भर देता है कुछ सामाजिक कुछ पारिवारिक, कुछ आर्थिक और कुछ खुद की अकांक्षाओ के प्रतिरोध में पुराने सपनो को नये सपनो से विस्थापित करते हुए चलना ही शायद गतिशील जीवन का दूसरा नाम है

हालाँकि आज भी जब रेलगाड़ी की पौं पौं कहीं दूर से भी इन कानो में सुनाई देती है तो वैसी की कशिश महसूस होती है जैसे बचपन के पहले प्यार का ख्याल आ गया हो , जिससे कभी अपने दिल की बात न कह सके  

Thursday, June 27, 2013

मैं फिसलता जा रहा हूँ



मैं फिसलता जा रहा हूँ ,
ख्वाब की गहराईयों में !
देखता रहता हूँ हर पल,
अपने कलेजे के अँधेरे,
कोशिश की खुद को ढूडने की,
पा नही पाया स्वयं को,
मैं फिसलता जा रहा हूँ...

कोई जरा मुझको बताये
है मेरा अस्तित्व क्या?
कौन हूँ ? क्या चाहता हूँ?
क्या करूँगा? क्या पता?
हर समय खुद को ही पाने
की चाह मन में हूँ लिए 
मैं फिसलता जा रहा हूँ....

है बहुत फिसलन डगर में
मंजिल अभी भी दूर हैं,
हौसला रखना पड़ेगा 
बस यही दस्तूर है,
देखना बस चाहता हूँ, खुद की,
हिम्मतों की हैसियत 
मैं फिसलता जा रहा हूँ... 

उठ रे मन ! तू उठ जरा
अंधड़ों का आनंद ले 
सोने में है क्या धरा 
खुद को, रतजगों से बांध दे
देख फिर तेरे अँधेरे 
खुद ब खुद जग जाएँगे
मैं फिसलता जा रहा हूँ ...

Thursday, February 14, 2013

गृहस्थ

कल एक पुराने मित्र से अचानक बाज़ार में मिलना हुआ। मित्रता तो घनिष्ट थी लेकिन कुछ महीनों से संवाद टूटा हुआ था। एक दुसरे को अचानक सामने पाकर असीम ख़ुशी का एहसास हुआ लेकिन मन में टूटे हुए संवाद को लेकर कुछ शिकायतें थीं । वार्तालाप  शुरू हुआ जिसके कुछ अंश शब्दशः इस प्रकार हैं:-

मैं: अबे तेरी! तू जिंदा है?
दोस्त: हाँ बे ! दुनिया में ही हूँ।

मैं: सुना शादी कर लिए तुम?
दोस्त: हाँ! साले तेरे दुनिया भर के कांटेक्ट, फेसबुक, इ-मेल सब ट्राई किया पर तेरा पता ही नही चला। कहाँ था तू?

मैं: कर्म योग में व्यस्त था। दुनिया से कांटेक्ट नही था। खैर, लेकिन तुम्हारी तो खेलने कूदने, खाने-पीने, घूमने-फिरने मौज-मस्ती की उम्र थी। तुम तो घर बसा बेठे मियां?
दोस्त : हाँ! कभी न कभी तो बंधना था, अभी बंध गये।

मैं: तो कैसा है नया जीवन?
दोस्त: बहुत शानदार। लाइफ सेट है अब तो।

मैं: अच्छा! शौक और होबीस के क्या हाल है? कोई नया गाना कंपोज़ किया?
दोस्त: नही यार। अभी जिंदगी का म्यूजिक एन्जॉय कर रहा हूँ।

मैं: कल ब्लॉग देखा था तेरा। उसमे भी आखिरी एंट्री पिछले साल की थी?
दोस्त: हाँ यार। आजकल इतने ब्लॉग हो गये है, किसे फुर्सत है अपना ब्लॉग पढने की?

मैं: ये तेरा पेट क्यूँ बाहर निकल रहा है? तू ही तो एक था जिसके सिक्स पैक्स की हम कहानियां सुनाते थे।
दोस्त: यार! अब जबरन में बॉडी को क्यूँ कष्ट दें।आराम से खाओ और जिओ।

मैं: पाण्डेय कह रहा था तू आजकल डेली शेव करने लगा है?
दोस्त: हाँ यार। पर्सनल हाइजीन सबको मेन्टेन करनी चाहिए।

मैं: अभी कहाँ से आ रहा है?
दोस्त: सब्जी लेने गया था।

मैं: साले! आज सूरज पूरब से ही निकला था न? तू सब्जी भी खरीदने लगा?
दोस्त: यार! ये सब करते रहना चाहिए। आटे-दाल के भाव मालूम होते हैं और पाँव ज़मीन पर टिके रहते हैं।

मैं: दिखा क्या लाया सब्जी में?
दोस्त: भिन्डी है।

मैं: अबे भिन्डी की तरफ तो तू देखता भी नही था?
दोस्त: यार भिन्डी से टेस्टी कुछ नही है ये बात मुझे कुछ महीनो पहले ही पता चली। मैं ही मूरख था
जो पसंद नही करता था।

मैं: अच्छा !  चल छोड़। पाण्डे कस्टम से नया ब्रांड लाया है। इस वीकेंड जमाते हैं बैठक?
दोस्त: नही, इस वीकेंड नही। मंदिर जाना है।

मैं: क्या? तूने पूजा पाठ भी शुरू कर दिया?
दोस्त: मंदिर जाने से मन को शांति मिलती है। ये तुझ जैसा नास्तिक नही समझेगा।

मैं: अबे, बड़ी जल्दी भूल गया , तू ही तो हम नास्तिकों का नेता था बे। चल कोई नही, अगले वीकेंड रखते हैं कार्यक्रम?
दोस्त: नही यार, अगले वीकेंड ससुराल से कुछ मेहमान आ रहे हैं।

वार्तालाप चल ही रहा था कि मित्र के मोबाइल फ़ोन में एक रोमांटिक रिंगटोन घनघना उठी।

दोस्त: हैलो …..हाँ डार्लिंग …..हाँ डार्लिंग ….....हाँ डार्लिंग …...नही डार्लिंग ….नही डार्लिंग ...हाँ डार्लिंग …...ओके डार्लिंग …... ओके डार्लिंग ….. हाँ डार्लिंग … जैसा ठीक लगे डार्लिंग ….. ओके डार्लिंग …. बस दो मिनिट डार्लिंग …... रास्ते में हूँ डार्लिंग …. ओके डार्लिंग …......... ओके डार्लिंग …......बाय।

मैं: (प्रश्नात्मक नज़र से ) ?
दोस्त: अब चलता हूँ, बाद में फ़ोन करता हूँ तुझे।

दोस्त: (जाते जाते ) यार एक बात बोलूं?
मैं: बोल।

दोस्त: तू कब कर रहा है शादी?
मैं: अभी सोचा नही। क्यों?

दोस्त: जल्दी कर ले यार! यूँ अकेले तड़पते अच्छा नही लगता। कोई तो हमदर्द मिले।


अब मुझे एक साल से टूटे हुए संवाद को लेकर मित्र से कोई शिकायत नही थी।

Wednesday, January 23, 2013

मैं आलसी हूँ




मैं आलसी हूँ मुझको आराम चाहिए,
दिन रात ही नही सुबह शाम चाहिए।

इश्क बेपनाह तकलीफों का खेल है,
मुझको कोई मुश्किल नही काम चाहिए।

भेजा है जो खुदा ने तो वो पाल भी देगा,
फिर अपनी जिंदगी क्यूँ हराम चाहिए।

आता नही मुझे कुछ बंजर दिमाग हूँ,
मुझको राजनीती का इनाम चाहिए।


अपने वजूद की क़द्र है ही नही मुझे,
क्यूँ न फिर से होना गुलाम चाहिए।