मैं आलसी हूँ मुझको आराम चाहिए,
दिन रात ही नही सुबह शाम चाहिए।
इश्क बेपनाह तकलीफों का खेल है,
मुझको कोई मुश्किल नही काम चाहिए।
भेजा है जो खुदा ने तो वो पाल भी देगा,
फिर अपनी जिंदगी क्यूँ हराम चाहिए।
आता नही मुझे कुछ बंजर दिमाग हूँ,
मुझको राजनीती का इनाम चाहिए।
अपने वजूद की क़द्र है ही नही मुझे,
क्यूँ न फिर से होना गुलाम चाहिए।

बहुत सही आदित्य भाई ...
ReplyDeleteतेरी कलम दिनों दिन सटीक होती जा रही है...
में "एक देशभक्त हु" का क्या चल रहा है अभी??