आज सुबह घर से अपनी मोटर साइकिल पर बाजार जाने के लिए निकला तो गाड़ी का बैलेंस बिगड़ा हुआ लगा । पीछे झुक कर देखा तो पिछला पहिया पंचर था । लो आ गयी मुसीबत, इतनी बड़ी गाड़ी को अब कैसे धकेला जायेगा ? खुश किस्मती से पास ही भाईजान पंचर वाले की दुकान थी ! उस समय लगा की शायद कोई पुण्य काम आड़े आ गया और मुसीबत से बच गये । भाई जान को आदाब कह पंचर बनने के लिए गाड़ी दे दी । दुकान की खासियत थी की दुकान में केवल पंचर का ही काम होता था । पंचरों से मेरा भी पुराना रिश्ता है, पहले स्कूल के समय साइकिल के पंचर अब काम के वक्त मोटर साइकिल के पंचर, लेकिन पंचरों से रोजी रोटी की पूर्ति के बारे में हमेशा से नकरात्मक जिज्ञासा रही है । मैं अपने पंचरो की कहानियों के बारे में विचार मग्न था तभी एक ट्रेक्टर सामने आकर रुका । मेरे मन में चल रही पंचरो की कहानियों में ट्रेक्टर का पहिया भी आ गया । पहला प्रश्न यही था की इतने बड़े पहिये का पंचर कैसे बनता होगा । पहले तो मन ने पंचर की बात ही नकार दी कि इतने मोटे टायर में पंचर कैसे हो सकता है । लेकिन होने को तो कुछ भी हो सकता है । फिर सोचा कि एक बार ट्रेक्टर के मालिक से पूछ लेते हैं । पूछने में क्या जाता है ।
मैंने बड़े टायर की ओर इशारा करते हुए कहा " भैया इसमे भी पंचर होता है क्या ?"
जबाब मिला "हाँ भैया ! इसमे भी हो जाता है ।"
"और यदि बीच खेत में हो जाये तो ?"
"तो भैया ! बड़ी बखेड़ा आ जाती है "
अब बात मन से दिमाग में आ चुकी थी । ट्रेक्टर के पंचर ने दिमाग में कौतुहल जगा दिया था । पंचर वाले भाईजान से ट्रेक्टर के पंचरों की बात छेड़ने पर एक नयी कहानी सामने आई । भाई जान ने बताया की ट्रेक्टर, ट्रक, हार्वेस्टर के पंचर ही उनका असली बिज़नस है मोटर साइकिल तो एक समाज सेवा है । इन सबमे सबसे कठिन ट्रेक्टर का पंचर होता है । पहला विकल्प तो पहिये को दुकान में लाना होता है लेकिन कई बार ट्रेक्टर इतनी दुर्गम्य जगह पर होता है कि ओन साईट सेवा देनी पड़ती है । ओन साईट सेवा की अपनी अलग परेशानिया हैं । कई बार बीच खेत में सिंचाई से गीली ज़मीन पर कीचड़ से लथपथ होकर पंचर ठीक करना पड़ता है । और बारिश के मौसम में ऐसे पंचर अपने आप में एक चैलेंज से कम नही।
पंचरों का अंक गणित मेरे जेहन में भंवर की भांति घूमने लगा। चर्चा के दौरान जब ट्रक्टर मालिक की ओर देखा तो वह अपनी कहानी बताने की आतुरता को छिपा नही पा रहा था । जब मैंने उसकी ओर प्रश्नात्मक नज़र की तो उसने खुद की आप बीती बयां कर दी । बीच खेत में हुआ पंचर एक किसान के लिए कोई विपदा से कम नही । दिन भर का काम तो रुकता ही है साथ में दिन भर की शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ तोहफे में मिलती हैं । आज हर जगह मजदूरों की बहुत मारामारी है , यदि उस दिन कोई काम मजदूरों वाला हो जो पंचर की वजह से रुक जाये तो फिर उसकी अगली तारीख तय करना मुश्किल हो जाता है। मजदूरों की उस दिन की मजदूरी गयी सो अलग।
उस दिन मुझे भाईजान की पंचर वाली दुकान की अहमियत समझ में आई । दूर से छोटा दिखने वाले काम की कुछ लोगो के लिए कितनी बड़ी महत्ता है , उस दिन यह बात समझ आई।
