Wednesday, November 20, 2013

सपने और यथार्थ !!!


“बेटा! क्या बनोगे बड़े होकर ?”
“इंजिनियर !”
“किस चीज़ का इंजिनियर ?”
“रेल गाड़ी का !”


ये सवाल और जबाब तब के हैं जब में हाफ पेंट पहन कर स्कूल जाता था । भोले मन ने इंजिनियर बनने का सपना तभी देख लिया था जब पहली बार किसी ने  बताया था की बड़े होकर कुछ बनना होता है ।  रेलगाड़ी का इंजिनियर इसलिए क्यूंकि घर रेलवे स्टेशन के पास था। रोज रोज इतने भारी  अजूबे को लोहे की पांतों पर सरपट दौड़ते देखकर भोला मन यही सोचता था की ये चमत्कार करने वाले अलौकिक शक्तिओ के स्वामी होंगे  रेलगाड़ी और इंजिनियर- इन दो शब्दों ने अन्तरंग में जगह बना ली थी और दोनों शब्द एक दुसरे के पर्यायवाची बन चुके थे जब कोई रेलगाड़ी दिख जाती तो इस चमत्कार के पीछे इश्वर रूपी अवतरण नजर आता जिसे चमत्कारों का वरदान प्राप्त हो, और जब कोई इंजिनियर की बात छेड़ता तो सरपट दौड़ती रेलगाड़ी की पौं पौं मन मस्तिस्क में छा जाती

खैर ये तो बालक मन था बालक मन की कल्पना की उड़ान भी अजीब ही होती है जैसे बहते पानी की धार को जहाँ जगह मिली वहीँ बह गया वैसे ही बालक मन को जहा खुली जगह मिली वही उड़ लिया


समय आगे बढ़ने लगा; उम्र बढ़ने लगी; समझ बढ़ने लगी  कल्पनाओ के प्रतिबिम्बों को यथार्थता के वास्तविक चित्र विस्थापित करने लगे
। गोयाकि
कच्ची उमर में मन में बुवे हुए बीजो की जड़े आजीवन रहती है
रेलगाड़ी तो धुंधली हो चुकी थी लेकिन इंजीनियरिंग का भूत चढ़ गया था
कोई महापुरुष कह गया था कि "सावधान ! सपने सोच समझ कर देखो , वो सच भी हो सकते हैं " माहोल कुछ ऐसा बना की पढने लिखने वाले सहपाठी मिल गये
मित्रो की मित्रता की धक्कम पेल में एंट्रेंस निकल गया और इंजीनियरिंग में दाखिला मिल गया
(आजकल तो पेसो में मिल जाता है, पढने की जरुरत नही है, ये वाकया तब का है जब गली गली में कॉलेज न थे ) 

मन प्रसन्न था; नया जोश था; खून में उबाल भी था कुछ भी काम असंभव न लग रहा था अच्छे कॉलेज में एडमिशन जो मिल गया था 

मस्तिष्क का मनोविज्ञान भी अजब है एक सफलता से ऐसा प्रतीत होता है मानो दुंनिया में कुछ भी असंभव नही, वही दूसरी तरफ एक असफलता यह महसूस करवा देती है कि पूरा जीवन ही निरर्थक है, अब कुछ नही हो सकता लेकिन ये तो समय का चक्र है, कभी ऊपर- कभी नीचे सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें! आगे क्या होता है 

जब उबले हुए रक्त की तपिश कम हुई, अतीत की सफलताओं की रंग रेलियों की स्मृतियाँ धुंधली पड़ने लगी, जब सामने जिम्मेदारिओं के पहाड़ो की ऊँची चोटिया चुनौती देने लगी तब एक दिन अचानक तन्द्रा भंग हुई और इस "रेलगाड़ी का इंजिनियर" बनने वाले मन ने खुद को कंप्यूटर की दुनिया में गोते लगाते पाया सब कुछ नया नया लगने लगा सपने अनजाने से लगने लगे पहले तो मन ने मानने से इंकार किया, लेकिन कल्पना वास्तविकता पर जायदा देर हावी नही रह सकती कोई और उपाय न था नये सपनो से दोस्ती ही आसान रास्ता था जब मन कभी उदास होता तो यह सोचकर सांत्वना मिल जाती कि रेलगाड़ी का न सही कंप्यूटर का सही, इंजिनियर तो है.  

अब सामने एक नया सपना था नई राह थी समय का पहिया और मनुष्य की अनुकूलन क्षमता दोनों का तालमेल सारे पुराने घाव भर देता है कुछ सामाजिक कुछ पारिवारिक, कुछ आर्थिक और कुछ खुद की अकांक्षाओ के प्रतिरोध में पुराने सपनो को नये सपनो से विस्थापित करते हुए चलना ही शायद गतिशील जीवन का दूसरा नाम है

हालाँकि आज भी जब रेलगाड़ी की पौं पौं कहीं दूर से भी इन कानो में सुनाई देती है तो वैसी की कशिश महसूस होती है जैसे बचपन के पहले प्यार का ख्याल आ गया हो , जिससे कभी अपने दिल की बात न कह सके