Friday, December 21, 2012

समझदार

आग लगने पर कुआँ खोदते समझदार ,
अफ़सोस जल्द ही कुआँ,
अधूरा छोड़ दिया जायेगा ।
फिर से आग लगेगी,
कुएं में कचरा मिलेगा,
हम फिर चीखेंगे,
चिल्लायेंगे, दहाड़ेंगे 
लेकिन फिर से, मातम शोर मचायेगा ।
समझ नही आता, 
ये मेरी समझ से परे है,
कब तक सिंह अपनी गुफा में  बुद्बुदायेगा,
कब तक यूँ ही गीदड़ खुलेआम गुर्रायेगा।

Thursday, December 13, 2012

तले आलू


एक अरसे बाद पुराने मित्रों से मिलना हुआ। सभी ने कहीं बैठकर पुरानी यादें ताज़ा करने और गप्पें मारने का फैसला किया । एक मित्र बोला की वहीँ बैठते हैं जहाँ पहले फोक्टाई और कडकी के दिनों में बैठा करते थे। तो दूसरा मित्र जो लोकल था और जिसे रोजी रोटी की तलाश में नगर पलायन नही करना पड़ा , बोला कि अब वो पुरानी जगह ख़त्म है। हर तरफ नया डेवलपमेंट हो गया है। शहर तरक्की पर है। पूरे शहर का रेनोवेशन हो गया है।

जानकार अच्छा लगा। जिस शहर ने पांव पे खड़ा होना सिखाया उसकी तरक्की की खबर दिल को खुश करने वाली थी, लेकिन इस डेवलपमेंट और  रेनोवेशन में पुराने अड्डों की बलि चढ़ गयी, इसका भी उतना ही दुःख था।

खैर , समय बदलता है तो जीने के आयाम भी बदल जाते हैं। गप्पें तो मारनी थीं, उसके बिना मित्र मिलन अधूरा था। पता चला कि नज़दीक ही एक नया मॉल खुला है। वही चलने का सुझाव रखा गया।  मॉल का विकल्प सभी को अच्छा लगा। मॉल्स की खासियत होती है कि वहां पर फोकट घूमना निशुल्क होता है। और जब घूम घूम कर थक जाओ तो फ़ूड कोर्ट में बेठने की आरामदायक व्यवस्था भी होती है। चूँकि सप्ताहांत था, इसलिए संध्या से कुछ समय पहले पहुंचकर अपनी जगह घेर ली।

परस्पर गप्पों का सिलसिला शुरू हो गया। गप्पें कब चर्चाओं में बदल गयीं पता ही नही चला। जब नए मुद्दों की तलाश में चर्चाओं में अल्पविराम हुआ तो किसी को भूख लग आई। जहाँ हमने आसनी जमा राखी थी वहीँ सामने मैकडी (McDonald ) का आउटलेट था। चूँकि खाना मूल उद्देश्य नही था इसलिए ज्यादा ना सोच कर मैकडी को ही तवज्जो दे दी गयी।

कुछ ही देर में मैकडी का परंपरागत आर्डर (बर्गर , फ्रेंच फ्राई , कोल्ड ड्रिंक ) हमारे सामने था। एक दुसरे को पूछने की औपचारिकता ना करते हुए सभी ने अपने अपने बर्गर पर अधिकार कर लिया।

समझदार एवं पढ़े लिखे दोस्तों की संगती का सबसे बड़ा फायदा होता है कि किसी भी छोटी बात पर  गहराई से चर्चा होती है। निष्कर्ष निकले या न निकले , तर्क-वितर्क और यहाँ तक कि कुतर्क आवश्यक रूप से प्रस्तुत किये जाते हैं। और हो भी क्यूँ न। मल्टी नेशनल्स में नौकरी की पहली जरुरत एनालिटिकल स्किल की होती है । भले ही ये क्षमता हो, या न हो, दिखाना तो पड़ता है।

“यार ! ये खाना नही चाहिए” फ्रेंच फ्राई खाते हुए एक बोला।
“क्यों ?”
“तले आलू सेहत के लिए अच्छे नही होते।”
“फिर क्या करें ? आर्डर तो वापस होगा नही।”
“नही ! अभी खा लेते हैं। आगे से ध्यान रखना।”

ज्ञान की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। मुद्दे की तलाश में भूखे बेठे शेरों को शिकार मिल चुका था। सभी के अंतरमन में फ्रांस के आलू तलाने लगे थे।

“लेकिन तले आलुओं से नुकसान क्या है? बचपन में टिफ़िन में भी तो ज्यादातर तले आलू ले जाते थे।”

“नही ! मैने कल ही एक आर्टिकल पढ़ा की आलू उबाल के खा लो, लेकिन तल कर मत खाओ। आज दुनिया में सबसे ज्यादा मोटापा अमरीका में है। और उसमे इन तले आलुओं का भारी योगदान है।”

“लेकिन फ्रांस के तले आलू अमरीका में मोटापा फैला रहे हैं? बात थोड़ी टेड़ी नही लगती? ”


प्रश्न वाजिब था। वैसे तो हमारे देश में भी हर घर में आलू तलाते  हैं, और न जाने कब से तला रहे हैं। लेकिन नमक लगे लम्बे और हलके कुरकुरे तले हुए आलुओं को दुनिया में पहुचाने  का श्रेय यूरोप  को दिया जाता है। और सबसे मजेदार बात ये  है कि फ्रांस के नाम से मशहूर तले आलुओं का उद्गमन बेल्जियम में हुआ। वैश्विकरण और बाज़ार में प्रस्तुतीकरण की प्रतिस्पर्धा ने बेल्जियम में इजाद हुए  फ्रांस के तले आलुओं को दुनिया भर में पहुंचा दिया, जिन्हें सबसे ज्यादा अमरीका में खाया जाता है।

हमारे देश में भी आलू तलकर खाना एक चटपटा अनुभव रहा है। आलू की टिक्की का इतिहास भी पुराने रजवाड़ों जितना पुराना है। गहरे तेल में तली, छोले मटर के साथ चटपटी चट्नियो मे डूबी हुई आलू की टिक्की का स्वाद हर भार्तीय की जुबान पर चढ़ा हुआ है। हालाँकि, आज रेनोवेशन और उदारवाद की बैसाखी का सहारा पाकर फ्रांस के तले आलू (जो कि बेल्जियम में जन्मे थे ), हमारी देसी तेल में तली हुई टिक्की को चुनौती दे रहे हैं।

खैर, बाजार पर किसी का एकाधिकार नही होता । जिसकी व्यापारिक नीतिया उपभोगताओं को रिझाने में सफल हैं वो नमक लगे तले आलू भी बेंच लेता है। फर्क सिर्फ इतना है कि कल हम स्नैक्स में आलू टिक्की खा रहे थे, आज तले  आलू भी खाने लगे है, लेकिन आज की व्यस्त दिनचर्या में इन लुभावने , जीभ से पानी टपकवाने वाले पकवानों का सेहत में योगदान जानते हुए भी अनदेखा कर  देते हैं ।

पढ़े लिखे मित्रों की संगत का एक पहलू ये भी है कि किसी भी मुद्दे की जानकारी में कोई कमी नही रहती। और जिन बिन्दुओं में कुछ  तथ्यों की कमी की सम्भावना होती है उन्हें ऊँगली पर रखे हुए ज्ञान कोशों से पूर्ण कर लिया जाता है।

बहस लगातार जारी थी। जो हल्की फुल्की भूख थी वो भी मिट चुकी थी। तले आलुओं का गहराई से चिंतन कर उन्हें चट किया जा चूका था। और अपने अपने गंतव्य पर जाने का समय हो चूका था।

समय की विडंबना यही है कि जब पर्याप्त से अधिक खाने को उपलब्ध हो तभी डाइटिंग की नौबत आती है। बैठक से भरी हुई, कम शारीरिक मेहनत  वाली दिनचर्या में तले आलुओं के अधाधुंध सेवन के परिणाम किसी भी शिक्षित से छिपे नही है। लेकिन, शायद समस्याओं और उनके समाधान पर चर्चा करना मात्र ही हमारी जागरूकता को प्रमाणित करता है। हम तथ्यों और उनके परिणामों को जानते हुए भी केवल चर्चाओं तक सीमित रह जाते हैं। शायद इसीलिए दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र होने के बाबजूद भी हम अनेक बुनियादी समस्याओं से ग्रस्त हैं।

Friday, November 30, 2012

पंचर


आज सुबह घर से अपनी मोटर साइकिल पर  बाजार जाने के लिए निकला तो गाड़ी का बैलेंस बिगड़ा हुआ लगा । पीछे झुक कर देखा तो पिछला पहिया पंचर  था । लो आ गयी मुसीबत, इतनी बड़ी गाड़ी को अब कैसे धकेला जायेगा ?   खुश किस्मती से पास ही भाईजान पंचर वाले की दुकान थी ! उस समय लगा की शायद कोई पुण्य काम आड़े आ गया और मुसीबत से बच गये ।  भाई जान को आदाब कह पंचर बनने के लिए गाड़ी दे दी । दुकान की खासियत थी की दुकान में केवल पंचर का ही काम होता था । पंचरों से मेरा भी पुराना रिश्ता है, पहले स्कूल के समय साइकिल के पंचर अब काम के वक्त मोटर साइकिल के पंचर, लेकिन पंचरों से रोजी रोटी की पूर्ति के बारे में हमेशा से नकरात्मक जिज्ञासा रही है । मैं अपने पंचरो  की कहानियों के बारे में विचार मग्न था तभी एक ट्रेक्टर सामने आकर रुका । मेरे मन में चल रही पंचरो की कहानियों में ट्रेक्टर का पहिया भी आ गया । पहला प्रश्न यही था की इतने बड़े पहिये का पंचर कैसे बनता होगा । पहले तो मन ने पंचर की बात ही नकार दी कि इतने मोटे टायर में पंचर कैसे हो सकता है । लेकिन होने को तो कुछ भी हो सकता  है । फिर सोचा कि एक बार ट्रेक्टर के मालिक से पूछ लेते हैं । पूछने में क्या जाता है ।

मैंने  बड़े टायर की ओर इशारा करते हुए कहा " भैया इसमे भी पंचर होता है क्या ?"
जबाब मिला "हाँ भैया ! इसमे भी हो जाता है ।"
"और यदि बीच खेत में हो जाये तो ?"
"तो भैया ! बड़ी बखेड़ा आ जाती है "

     अब बात मन से दिमाग में आ चुकी थी । ट्रेक्टर के पंचर ने दिमाग में कौतुहल जगा दिया था । पंचर वाले भाईजान से ट्रेक्टर के पंचरों की बात छेड़ने पर एक नयी कहानी सामने आई । भाई जान ने बताया की ट्रेक्टर, ट्रक,  हार्वेस्टर के पंचर ही उनका असली बिज़नस है मोटर साइकिल तो एक समाज सेवा है । इन सबमे सबसे कठिन ट्रेक्टर का पंचर होता है । पहला विकल्प तो पहिये को दुकान में लाना होता है लेकिन कई बार ट्रेक्टर इतनी दुर्गम्य जगह पर होता है कि  ओन साईट सेवा देनी पड़ती है । ओन साईट सेवा की अपनी अलग परेशानिया हैं । कई बार बीच खेत में  सिंचाई से  गीली ज़मीन पर कीचड़ से लथपथ होकर पंचर ठीक करना पड़ता है । और बारिश के मौसम में ऐसे पंचर अपने आप में एक चैलेंज से कम नही।
       
      पंचरों का अंक गणित मेरे जेहन में भंवर की भांति घूमने लगा। चर्चा के दौरान जब ट्रक्टर मालिक की ओर देखा तो वह अपनी कहानी बताने की आतुरता को छिपा नही पा रहा था । जब मैंने उसकी ओर प्रश्नात्मक नज़र की तो उसने खुद की आप बीती बयां कर दी । बीच खेत में हुआ पंचर एक किसान के लिए कोई विपदा से कम नही । दिन भर का काम तो रुकता ही है साथ में दिन भर की शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ तोहफे में मिलती हैं । आज हर जगह मजदूरों की बहुत मारामारी है , यदि उस दिन कोई काम मजदूरों वाला हो जो पंचर की वजह से रुक जाये तो फिर उसकी अगली तारीख तय करना मुश्किल हो जाता है। मजदूरों की उस दिन की मजदूरी गयी सो अलग।
       
     उस दिन मुझे भाईजान की पंचर वाली दुकान की अहमियत समझ में आई । दूर से छोटा दिखने वाले काम की कुछ लोगो के लिए कितनी बड़ी महत्ता है , उस दिन यह बात समझ आई।
   
  किसी भी देश की अर्थव्यवस्था छोटी छोटी इकाइयों का एक बड़ा समुच्चय होती है। इन इकाइयों की पारस्परिक निर्भरता अर्थव्यवस्था की पहली आवश्यकता है और इसका सुचारू क्रियान्वन अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाता है जिसमे हर वर्ग के व्यक्तियों को अपने योगदान के समान अवसर मिलने की उम्मीद की जाती  है।