कल एक पुराने मित्र से अचानक बाज़ार में मिलना हुआ। मित्रता तो घनिष्ट थी लेकिन कुछ महीनों से संवाद टूटा हुआ था। एक दुसरे को अचानक सामने पाकर असीम ख़ुशी का एहसास हुआ लेकिन मन में टूटे हुए संवाद को लेकर कुछ शिकायतें थीं । वार्तालाप शुरू हुआ जिसके कुछ अंश शब्दशः इस प्रकार हैं:-
मैं: अबे तेरी! तू जिंदा है?
दोस्त: हाँ बे ! दुनिया में ही हूँ।
मैं: सुना शादी कर लिए तुम?
दोस्त: हाँ! साले तेरे दुनिया भर के कांटेक्ट, फेसबुक, इ-मेल सब ट्राई किया पर तेरा पता ही नही चला। कहाँ था तू?
मैं: कर्म योग में व्यस्त था। दुनिया से कांटेक्ट नही था। खैर, लेकिन तुम्हारी तो खेलने कूदने, खाने-पीने, घूमने-फिरने मौज-मस्ती की उम्र थी। तुम तो घर बसा बेठे मियां?
दोस्त : हाँ! कभी न कभी तो बंधना था, अभी बंध गये।
मैं: तो कैसा है नया जीवन?
दोस्त: बहुत शानदार। लाइफ सेट है अब तो।
मैं: अच्छा! शौक और होबीस के क्या हाल है? कोई नया गाना कंपोज़ किया?
दोस्त: नही यार। अभी जिंदगी का म्यूजिक एन्जॉय कर रहा हूँ।
मैं: कल ब्लॉग देखा था तेरा। उसमे भी आखिरी एंट्री पिछले साल की थी?
दोस्त: हाँ यार। आजकल इतने ब्लॉग हो गये है, किसे फुर्सत है अपना ब्लॉग पढने की?
मैं: ये तेरा पेट क्यूँ बाहर निकल रहा है? तू ही तो एक था जिसके सिक्स पैक्स की हम कहानियां सुनाते थे।
दोस्त: यार! अब जबरन में बॉडी को क्यूँ कष्ट दें।आराम से खाओ और जिओ।
मैं: पाण्डेय कह रहा था तू आजकल डेली शेव करने लगा है?
दोस्त: हाँ यार। पर्सनल हाइजीन सबको मेन्टेन करनी चाहिए।
मैं: अभी कहाँ से आ रहा है?
दोस्त: सब्जी लेने गया था।
मैं: साले! आज सूरज पूरब से ही निकला था न? तू सब्जी भी खरीदने लगा?
दोस्त: यार! ये सब करते रहना चाहिए। आटे-दाल के भाव मालूम होते हैं और पाँव ज़मीन पर टिके रहते हैं।
मैं: दिखा क्या लाया सब्जी में?
दोस्त: भिन्डी है।
मैं: अबे भिन्डी की तरफ तो तू देखता भी नही था?
दोस्त: यार भिन्डी से टेस्टी कुछ नही है ये बात मुझे कुछ महीनो पहले ही पता चली। मैं ही मूरख था
जो पसंद नही करता था।
मैं: अच्छा ! चल छोड़। पाण्डे कस्टम से नया ब्रांड लाया है। इस वीकेंड जमाते हैं बैठक?
दोस्त: नही, इस वीकेंड नही। मंदिर जाना है।
मैं: क्या? तूने पूजा पाठ भी शुरू कर दिया?
दोस्त: मंदिर जाने से मन को शांति मिलती है। ये तुझ जैसा नास्तिक नही समझेगा।
मैं: अबे, बड़ी जल्दी भूल गया , तू ही तो हम नास्तिकों का नेता था बे। चल कोई नही, अगले वीकेंड रखते हैं कार्यक्रम?
दोस्त: नही यार, अगले वीकेंड ससुराल से कुछ मेहमान आ रहे हैं।
वार्तालाप चल ही रहा था कि मित्र के मोबाइल फ़ोन में एक रोमांटिक रिंगटोन घनघना उठी।
दोस्त: हैलो …..हाँ डार्लिंग …..हाँ डार्लिंग ….....हाँ डार्लिंग …...नही डार्लिंग ….नही डार्लिंग ...हाँ डार्लिंग …...ओके डार्लिंग …... ओके डार्लिंग ….. हाँ डार्लिंग … जैसा ठीक लगे डार्लिंग ….. ओके डार्लिंग …. बस दो मिनिट डार्लिंग …... रास्ते में हूँ डार्लिंग …. ओके डार्लिंग …......... ओके डार्लिंग …......बाय।
मैं: (प्रश्नात्मक नज़र से ) ?
दोस्त: अब चलता हूँ, बाद में फ़ोन करता हूँ तुझे।
दोस्त: (जाते जाते ) यार एक बात बोलूं?
मैं: बोल।
दोस्त: तू कब कर रहा है शादी?
मैं: अभी सोचा नही। क्यों?
दोस्त: जल्दी कर ले यार! यूँ अकेले तड़पते अच्छा नही लगता। कोई तो हमदर्द मिले।
अब मुझे एक साल से टूटे हुए संवाद को लेकर मित्र से कोई शिकायत नही थी।
मैं: अबे तेरी! तू जिंदा है?
दोस्त: हाँ बे ! दुनिया में ही हूँ।
मैं: सुना शादी कर लिए तुम?
दोस्त: हाँ! साले तेरे दुनिया भर के कांटेक्ट, फेसबुक, इ-मेल सब ट्राई किया पर तेरा पता ही नही चला। कहाँ था तू?
मैं: कर्म योग में व्यस्त था। दुनिया से कांटेक्ट नही था। खैर, लेकिन तुम्हारी तो खेलने कूदने, खाने-पीने, घूमने-फिरने मौज-मस्ती की उम्र थी। तुम तो घर बसा बेठे मियां?
दोस्त : हाँ! कभी न कभी तो बंधना था, अभी बंध गये।
मैं: तो कैसा है नया जीवन?
दोस्त: बहुत शानदार। लाइफ सेट है अब तो।
मैं: अच्छा! शौक और होबीस के क्या हाल है? कोई नया गाना कंपोज़ किया?
दोस्त: नही यार। अभी जिंदगी का म्यूजिक एन्जॉय कर रहा हूँ।
मैं: कल ब्लॉग देखा था तेरा। उसमे भी आखिरी एंट्री पिछले साल की थी?
दोस्त: हाँ यार। आजकल इतने ब्लॉग हो गये है, किसे फुर्सत है अपना ब्लॉग पढने की?
मैं: ये तेरा पेट क्यूँ बाहर निकल रहा है? तू ही तो एक था जिसके सिक्स पैक्स की हम कहानियां सुनाते थे।
दोस्त: यार! अब जबरन में बॉडी को क्यूँ कष्ट दें।आराम से खाओ और जिओ।
मैं: पाण्डेय कह रहा था तू आजकल डेली शेव करने लगा है?
दोस्त: हाँ यार। पर्सनल हाइजीन सबको मेन्टेन करनी चाहिए।
मैं: अभी कहाँ से आ रहा है?
दोस्त: सब्जी लेने गया था।
मैं: साले! आज सूरज पूरब से ही निकला था न? तू सब्जी भी खरीदने लगा?
दोस्त: यार! ये सब करते रहना चाहिए। आटे-दाल के भाव मालूम होते हैं और पाँव ज़मीन पर टिके रहते हैं।
मैं: दिखा क्या लाया सब्जी में?
दोस्त: भिन्डी है।
मैं: अबे भिन्डी की तरफ तो तू देखता भी नही था?
दोस्त: यार भिन्डी से टेस्टी कुछ नही है ये बात मुझे कुछ महीनो पहले ही पता चली। मैं ही मूरख था
जो पसंद नही करता था।
मैं: अच्छा ! चल छोड़। पाण्डे कस्टम से नया ब्रांड लाया है। इस वीकेंड जमाते हैं बैठक?
दोस्त: नही, इस वीकेंड नही। मंदिर जाना है।
मैं: क्या? तूने पूजा पाठ भी शुरू कर दिया?
दोस्त: मंदिर जाने से मन को शांति मिलती है। ये तुझ जैसा नास्तिक नही समझेगा।
मैं: अबे, बड़ी जल्दी भूल गया , तू ही तो हम नास्तिकों का नेता था बे। चल कोई नही, अगले वीकेंड रखते हैं कार्यक्रम?
दोस्त: नही यार, अगले वीकेंड ससुराल से कुछ मेहमान आ रहे हैं।
वार्तालाप चल ही रहा था कि मित्र के मोबाइल फ़ोन में एक रोमांटिक रिंगटोन घनघना उठी।
दोस्त: हैलो …..हाँ डार्लिंग …..हाँ डार्लिंग ….....हाँ डार्लिंग …...नही डार्लिंग ….नही डार्लिंग ...हाँ डार्लिंग …...ओके डार्लिंग …... ओके डार्लिंग ….. हाँ डार्लिंग … जैसा ठीक लगे डार्लिंग ….. ओके डार्लिंग …. बस दो मिनिट डार्लिंग …... रास्ते में हूँ डार्लिंग …. ओके डार्लिंग …......... ओके डार्लिंग …......बाय।
मैं: (प्रश्नात्मक नज़र से ) ?
दोस्त: अब चलता हूँ, बाद में फ़ोन करता हूँ तुझे।
दोस्त: (जाते जाते ) यार एक बात बोलूं?
मैं: बोल।
दोस्त: तू कब कर रहा है शादी?
मैं: अभी सोचा नही। क्यों?
दोस्त: जल्दी कर ले यार! यूँ अकेले तड़पते अच्छा नही लगता। कोई तो हमदर्द मिले।
अब मुझे एक साल से टूटे हुए संवाद को लेकर मित्र से कोई शिकायत नही थी।
