आंधी सी दिखाई देती है तूफांन-ए-बबंडर उठता सा है
तुम साथ चलो या चुप बेठो, मौजो का समंदर बढ़ता सा है
इस ज़ार निरंकुश तानाशाही की बुनियादें हिलती दिखती हैं
इक चिड़िया की परवाजों* से बाजों का मुकद्दर डुलता सा है
सर्द अँधेरी रातो में हमने बिन कम्बल खर्राटे मारे हैं
जो जाग गया न सो पाएगा, पल में सूरज चढ़ता सा है
वक़्त का चरखा घूम गया कल नीचे था, अब ऊपर है
जिम्मेदारी तय कर लो इतिहास बदलता दिखता सा है
* परवाज - उडान
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