आंधी सी दिखाई देती है तूफांन-ए-बबंडर उठता सा है
तुम साथ चलो या चुप बेठो, मौजो का समंदर बढ़ता सा है
इस ज़ार निरंकुश तानाशाही की बुनियादें हिलती दिखती हैं
इक चिड़िया की परवाजों* से बाजों का मुकद्दर डुलता सा है
सर्द अँधेरी रातो में हमने बिन कम्बल खर्राटे मारे हैं
जो जाग गया न सो पाएगा, पल में सूरज चढ़ता सा है
वक़्त का चरखा घूम गया कल नीचे था, अब ऊपर है
जिम्मेदारी तय कर लो इतिहास बदलता दिखता सा है
* परवाज - उडान
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Soch Sahi hai per Shabdo ki kami hai..Per aacha prayas mere bhai.
ReplyDeleteसत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध...Vajpayee Ji
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