Thursday, June 27, 2013

मैं फिसलता जा रहा हूँ



मैं फिसलता जा रहा हूँ ,
ख्वाब की गहराईयों में !
देखता रहता हूँ हर पल,
अपने कलेजे के अँधेरे,
कोशिश की खुद को ढूडने की,
पा नही पाया स्वयं को,
मैं फिसलता जा रहा हूँ...

कोई जरा मुझको बताये
है मेरा अस्तित्व क्या?
कौन हूँ ? क्या चाहता हूँ?
क्या करूँगा? क्या पता?
हर समय खुद को ही पाने
की चाह मन में हूँ लिए 
मैं फिसलता जा रहा हूँ....

है बहुत फिसलन डगर में
मंजिल अभी भी दूर हैं,
हौसला रखना पड़ेगा 
बस यही दस्तूर है,
देखना बस चाहता हूँ, खुद की,
हिम्मतों की हैसियत 
मैं फिसलता जा रहा हूँ... 

उठ रे मन ! तू उठ जरा
अंधड़ों का आनंद ले 
सोने में है क्या धरा 
खुद को, रतजगों से बांध दे
देख फिर तेरे अँधेरे 
खुद ब खुद जग जाएँगे
मैं फिसलता जा रहा हूँ ...

1 comment:

  1. bahut sunder adi....
    bas chalte raho.. manzeel ab paas hi hai ....
    :)

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