Thursday, December 13, 2012

तले आलू


एक अरसे बाद पुराने मित्रों से मिलना हुआ। सभी ने कहीं बैठकर पुरानी यादें ताज़ा करने और गप्पें मारने का फैसला किया । एक मित्र बोला की वहीँ बैठते हैं जहाँ पहले फोक्टाई और कडकी के दिनों में बैठा करते थे। तो दूसरा मित्र जो लोकल था और जिसे रोजी रोटी की तलाश में नगर पलायन नही करना पड़ा , बोला कि अब वो पुरानी जगह ख़त्म है। हर तरफ नया डेवलपमेंट हो गया है। शहर तरक्की पर है। पूरे शहर का रेनोवेशन हो गया है।

जानकार अच्छा लगा। जिस शहर ने पांव पे खड़ा होना सिखाया उसकी तरक्की की खबर दिल को खुश करने वाली थी, लेकिन इस डेवलपमेंट और  रेनोवेशन में पुराने अड्डों की बलि चढ़ गयी, इसका भी उतना ही दुःख था।

खैर , समय बदलता है तो जीने के आयाम भी बदल जाते हैं। गप्पें तो मारनी थीं, उसके बिना मित्र मिलन अधूरा था। पता चला कि नज़दीक ही एक नया मॉल खुला है। वही चलने का सुझाव रखा गया।  मॉल का विकल्प सभी को अच्छा लगा। मॉल्स की खासियत होती है कि वहां पर फोकट घूमना निशुल्क होता है। और जब घूम घूम कर थक जाओ तो फ़ूड कोर्ट में बेठने की आरामदायक व्यवस्था भी होती है। चूँकि सप्ताहांत था, इसलिए संध्या से कुछ समय पहले पहुंचकर अपनी जगह घेर ली।

परस्पर गप्पों का सिलसिला शुरू हो गया। गप्पें कब चर्चाओं में बदल गयीं पता ही नही चला। जब नए मुद्दों की तलाश में चर्चाओं में अल्पविराम हुआ तो किसी को भूख लग आई। जहाँ हमने आसनी जमा राखी थी वहीँ सामने मैकडी (McDonald ) का आउटलेट था। चूँकि खाना मूल उद्देश्य नही था इसलिए ज्यादा ना सोच कर मैकडी को ही तवज्जो दे दी गयी।

कुछ ही देर में मैकडी का परंपरागत आर्डर (बर्गर , फ्रेंच फ्राई , कोल्ड ड्रिंक ) हमारे सामने था। एक दुसरे को पूछने की औपचारिकता ना करते हुए सभी ने अपने अपने बर्गर पर अधिकार कर लिया।

समझदार एवं पढ़े लिखे दोस्तों की संगती का सबसे बड़ा फायदा होता है कि किसी भी छोटी बात पर  गहराई से चर्चा होती है। निष्कर्ष निकले या न निकले , तर्क-वितर्क और यहाँ तक कि कुतर्क आवश्यक रूप से प्रस्तुत किये जाते हैं। और हो भी क्यूँ न। मल्टी नेशनल्स में नौकरी की पहली जरुरत एनालिटिकल स्किल की होती है । भले ही ये क्षमता हो, या न हो, दिखाना तो पड़ता है।

“यार ! ये खाना नही चाहिए” फ्रेंच फ्राई खाते हुए एक बोला।
“क्यों ?”
“तले आलू सेहत के लिए अच्छे नही होते।”
“फिर क्या करें ? आर्डर तो वापस होगा नही।”
“नही ! अभी खा लेते हैं। आगे से ध्यान रखना।”

ज्ञान की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। मुद्दे की तलाश में भूखे बेठे शेरों को शिकार मिल चुका था। सभी के अंतरमन में फ्रांस के आलू तलाने लगे थे।

“लेकिन तले आलुओं से नुकसान क्या है? बचपन में टिफ़िन में भी तो ज्यादातर तले आलू ले जाते थे।”

“नही ! मैने कल ही एक आर्टिकल पढ़ा की आलू उबाल के खा लो, लेकिन तल कर मत खाओ। आज दुनिया में सबसे ज्यादा मोटापा अमरीका में है। और उसमे इन तले आलुओं का भारी योगदान है।”

“लेकिन फ्रांस के तले आलू अमरीका में मोटापा फैला रहे हैं? बात थोड़ी टेड़ी नही लगती? ”


प्रश्न वाजिब था। वैसे तो हमारे देश में भी हर घर में आलू तलाते  हैं, और न जाने कब से तला रहे हैं। लेकिन नमक लगे लम्बे और हलके कुरकुरे तले हुए आलुओं को दुनिया में पहुचाने  का श्रेय यूरोप  को दिया जाता है। और सबसे मजेदार बात ये  है कि फ्रांस के नाम से मशहूर तले आलुओं का उद्गमन बेल्जियम में हुआ। वैश्विकरण और बाज़ार में प्रस्तुतीकरण की प्रतिस्पर्धा ने बेल्जियम में इजाद हुए  फ्रांस के तले आलुओं को दुनिया भर में पहुंचा दिया, जिन्हें सबसे ज्यादा अमरीका में खाया जाता है।

हमारे देश में भी आलू तलकर खाना एक चटपटा अनुभव रहा है। आलू की टिक्की का इतिहास भी पुराने रजवाड़ों जितना पुराना है। गहरे तेल में तली, छोले मटर के साथ चटपटी चट्नियो मे डूबी हुई आलू की टिक्की का स्वाद हर भार्तीय की जुबान पर चढ़ा हुआ है। हालाँकि, आज रेनोवेशन और उदारवाद की बैसाखी का सहारा पाकर फ्रांस के तले आलू (जो कि बेल्जियम में जन्मे थे ), हमारी देसी तेल में तली हुई टिक्की को चुनौती दे रहे हैं।

खैर, बाजार पर किसी का एकाधिकार नही होता । जिसकी व्यापारिक नीतिया उपभोगताओं को रिझाने में सफल हैं वो नमक लगे तले आलू भी बेंच लेता है। फर्क सिर्फ इतना है कि कल हम स्नैक्स में आलू टिक्की खा रहे थे, आज तले  आलू भी खाने लगे है, लेकिन आज की व्यस्त दिनचर्या में इन लुभावने , जीभ से पानी टपकवाने वाले पकवानों का सेहत में योगदान जानते हुए भी अनदेखा कर  देते हैं ।

पढ़े लिखे मित्रों की संगत का एक पहलू ये भी है कि किसी भी मुद्दे की जानकारी में कोई कमी नही रहती। और जिन बिन्दुओं में कुछ  तथ्यों की कमी की सम्भावना होती है उन्हें ऊँगली पर रखे हुए ज्ञान कोशों से पूर्ण कर लिया जाता है।

बहस लगातार जारी थी। जो हल्की फुल्की भूख थी वो भी मिट चुकी थी। तले आलुओं का गहराई से चिंतन कर उन्हें चट किया जा चूका था। और अपने अपने गंतव्य पर जाने का समय हो चूका था।

समय की विडंबना यही है कि जब पर्याप्त से अधिक खाने को उपलब्ध हो तभी डाइटिंग की नौबत आती है। बैठक से भरी हुई, कम शारीरिक मेहनत  वाली दिनचर्या में तले आलुओं के अधाधुंध सेवन के परिणाम किसी भी शिक्षित से छिपे नही है। लेकिन, शायद समस्याओं और उनके समाधान पर चर्चा करना मात्र ही हमारी जागरूकता को प्रमाणित करता है। हम तथ्यों और उनके परिणामों को जानते हुए भी केवल चर्चाओं तक सीमित रह जाते हैं। शायद इसीलिए दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र होने के बाबजूद भी हम अनेक बुनियादी समस्याओं से ग्रस्त हैं।

8 comments:

  1. Nicely written. Story touches upon an important topic without being preachy. But obesity is not the problem of riches, poor people are equally susceptible to obesity. :)
    A story with a soul.

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  2. This comment has been removed by the author.

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  3. A superb start in blog writing, keep it up ur passion and i hope to see such more articles again, may be more serious next time . all the best Dubey!! :)

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  4. Gud one..Keep writing.. Serious nhi May be more funny next time. ;)

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  5. there are 3 important points that i derived from the story...

    1 every indian guy is nostalgic about the place and the people tht made him wat he is presently...

    2 tooo much knowledge or logic always complicates or makes you feel inferior about your instinct(saala bachpan se budhaape tak...hum bhi tale hue aalu hi khaa rahe hain...khaate rahenge...)

    3 when u are busy finding logics about something and trying to win a conversation you for get to taste the food properly... P.S. nobody told us about how the french fries tasted??

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  6. A well drafted Article..
    I must say Dubey -Good sense of Humor

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  7. A good article with a best conclusion.
    "हम तथ्यों और उनके परिणामों को जानते हुए भी केवल चर्चाओं तक सीमित रह जाते हैं। शायद इसीलिए दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र होने के बाबजूद भी हम अनेक बुनियादी समस्याओं से ग्रस्त हैं।"

    I Liked, that you have conveyed your message with a short and common story.

    I would like you to write something about "How to achieve solution/Success" because here again you mentioned problem not the solution. Please correct me is i am wrong.

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  8. tasty....I enjoyed it like I enjoy "tale aalu"
    "ज्ञान की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। मुद्दे की तलाश में भूखे बेठे शेरों को शिकार मिल चुका था।"...Ady touch :)

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